दीप पूजन
दीपक का महत्त्व, नित्य पूजन, कार्तिक दीपदान एवं लक्षवर्तिका व्रत-विधि
चेतना-जागरण का आध्यात्मिक विज्ञान
मूल गायत्री का पद-पद अर्थ, चौबीस अक्षरों के ऋषि-छन्द-देवता, जप और पुरश्चरण की विधि, और 108 देव-गायत्रियाँ — रोमन लिप्यन्तरण तथा हिन्दी-अंग्रेज़ी भावार्थ सहित।
लेखक श्री शिवबोध जी · प्रकाशक ShivBodh Trust

मनुस्मृति कहती है : “सावित्र्यास्तु परं नास्ति” — सावित्री (गायत्री) से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं। व्याकरण, निरुक्त और उपनिषदों के अध्ययन से समझ आता है कि चौबीस अक्षरों के इस छोटे-से मन्त्र में कितना कुछ समाया है। यह पुस्तक उसी समझ को साधकों तक सरल रूप में पहुँचाने का प्रयत्न है।
इस द्वितीय संस्करण में देव-गायत्रियों की सन्धि और व्याकरण हर मन्त्र में जाँचकर शुद्ध की गई है, चौबीस अक्षरों की तालिका देवीभागवत (12.1.13–26) के मूल पाठ से मिलाई गई है, बिना प्रमाण के वैज्ञानिक दावे हटाए गए हैं, और हर गायत्री के साथ रोमन लिप्यन्तरण तथा हिन्दी और अंग्रेज़ी भावार्थ जोड़े गए हैं।
पहले मन्त्र को समझें, फिर मूल गायत्री को, फिर उसकी व्यावहारिक साधना-विधि को।
मन्त्र क्या है, ऋषि मन्त्र के द्रष्टा क्यों कहे जाते हैं, शब्द-ब्रह्म और नाद, और जप का शरीर, प्राण तथा मन पर प्रभाव।
मूल मन्त्र, उसका पद-पद अर्थ, चौबीस अक्षरों की गणना, हर अक्षर के ऋषि, छन्द और देवता, और वेदमाता गायत्री।
जप का समय, दिशा और आसन; वाचिक, उपांशु और मानस जप; अनुष्ठान, पुरश्चरण, उच्चारण-मार्गदर्शिका और न्यूनतम दैनिक साधना।
हर गायत्री के साथ रोमन लिप्यन्तरण तथा हिन्दी और अंग्रेज़ी भावार्थ।
वैदिक मूल और गुरु-गायत्री, गणेश एवं त्रिदेव, शिव-परिवार, विष्णु के अवतार, प्रमुख देवियाँ, दश महाविद्या, सप्त मातृका, नवग्रह, दिक्पाल, 27 नक्षत्र, पवित्र नदियाँ और आचार्य।
पुस्तक में आए शास्त्रीय शब्दों के सरल अर्थ।
वेद, उपनिषद्, स्मृति और पुराणों के वे स्थल, जिनसे मन्त्र और सिद्धान्त मिलाए गए हैं।
सबसे पहले मूल गायत्री को शुद्ध उच्चारण और अर्थ के साथ अपनाएँ; बाकी सब उसी का विस्तार है।
भूमिका, अनुक्रमणिका और पूरा खण्ड 1 (मन्त्र-विज्ञान) — 14 पृष्ठ का मुफ़्त नमूना (PDF)।
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इस पुस्तक के मन्त्र और साधना-क्रम शास्त्रीय परम्परा पर आधारित हैं। किसी भी मन्त्र का अनुष्ठान, पुरश्चरण या कुण्डलिनी-सम्बन्धी अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करें। मन्त्र-जप किसी रोग की चिकित्सा का विकल्प नहीं है; स्वास्थ्य-सम्बन्धी विषयों में चिकित्सक का परामर्श आवश्यक है।
दीपक का महत्त्व, नित्य पूजन, कार्तिक दीपदान एवं लक्षवर्तिका व्रत-विधि
माँ गंगा का माहात्म्य, सम्पूर्ण पूजन-विधि, स्तोत्र एवं आरती

भक्तों के हृदय में श्रद्धा एवं भक्ति की ज्वाला प्रज्वलित करने वाला संकलन
विशेष : चारों पीठों के शंकराचार्यों की पारम्परिक जगद्गुरु विरुदावली स्तुति
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चार खण्ड हैं — मन्त्र-विज्ञान; मूल गायत्री का पद-पद अर्थ और चौबीस अक्षरों के ऋषि, छन्द और देवता; जप और पुरश्चरण की साधना-विधि; और 108 देव-गायत्रियों का संग्रह।
हाँ। हर गायत्री देवनागरी के साथ रोमन लिप्यन्तरण में दी गई है, और उसका हिन्दी तथा अंग्रेज़ी भावार्थ भी है।
यह पुस्तक समझ और दैनिक अभ्यास में सहायता के लिए है, गुरु का स्थान लेने के लिए नहीं। कोई भी अनुष्ठान, पुरश्चरण या कुण्डलिनी-सम्बन्धी अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करें। मन्त्र-जप किसी रोग की चिकित्सा का विकल्प नहीं है।
हाँ। इसी पृष्ठ पर भूमिका, अनुक्रमणिका और पूरे खण्ड 1 (मन्त्र-विज्ञान) वाला 14 पृष्ठ का मुफ़्त नमूना उपलब्ध है।
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