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गायत्री मन्त्र संग्रह

चेतना-जागरण का आध्यात्मिक विज्ञान

मूल गायत्री का पद-पद अर्थ, चौबीस अक्षरों के ऋषि-छन्द-देवता, जप और पुरश्चरण की विधि, और 108 देव-गायत्रियाँ — रोमन लिप्यन्तरण तथा हिन्दी-अंग्रेज़ी भावार्थ सहित।

लेखक श्री शिवबोध जी · प्रकाशक ShivBodh Trust

गायत्री मन्त्र संग्रह — चेतना-जागरण का आध्यात्मिक विज्ञान
  • 91पृष्ठ
  • PDF + EPUBदोनों फ़ाइलें
  • हिन्दी + Englishमूल संस्कृत एवं रोमन सहित
  • 108देव-गायत्री

चौबीस अक्षरों में समाया हुआ ज्ञान, सरल भाषा में

मनुस्मृति कहती है : “सावित्र्यास्तु परं नास्ति” — सावित्री (गायत्री) से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं। व्याकरण, निरुक्त और उपनिषदों के अध्ययन से समझ आता है कि चौबीस अक्षरों के इस छोटे-से मन्त्र में कितना कुछ समाया है। यह पुस्तक उसी समझ को साधकों तक सरल रूप में पहुँचाने का प्रयत्न है।

इस द्वितीय संस्करण में देव-गायत्रियों की सन्धि और व्याकरण हर मन्त्र में जाँचकर शुद्ध की गई है, चौबीस अक्षरों की तालिका देवीभागवत (12.1.13–26) के मूल पाठ से मिलाई गई है, बिना प्रमाण के वैज्ञानिक दावे हटाए गए हैं, और हर गायत्री के साथ रोमन लिप्यन्तरण तथा हिन्दी और अंग्रेज़ी भावार्थ जोड़े गए हैं।

यह पुस्तक किसके लिए है?

  • वे साधक, जो सन्ध्या-वन्दन और प्रतिदिन गायत्री-जप शुद्ध उच्चारण और अर्थ के साथ करना चाहते हैं।
  • वे उपासक, जो अपने इष्ट-देवता की गायत्री खोज रहे हैं — गणेश, शिव, विष्णु, देवी, नवग्रह और नक्षत्र।
  • वे जिज्ञासु, जो मन्त्र-विज्ञान, ऋषि-छन्द-देवता और जप के प्रकार शास्त्र के आधार पर समझना चाहते हैं।
  • वे पाठक, जो देवनागरी के साथ रोमन लिप्यन्तरण और अंग्रेज़ी भावार्थ भी चाहते हैं।

चार खण्ड, एक सौ आठ गायत्रियाँ

सिद्धान्त एवं साधना

पहले मन्त्र को समझें, फिर मूल गायत्री को, फिर उसकी व्यावहारिक साधना-विधि को।

  1. खण्ड 1

    मन्त्र-विज्ञान : मानव और ब्रह्माण्ड का सेतु

    मन्त्र क्या है, ऋषि मन्त्र के द्रष्टा क्यों कहे जाते हैं, शब्द-ब्रह्म और नाद, और जप का शरीर, प्राण तथा मन पर प्रभाव।

  2. खण्ड 2

    गायत्री : सिद्धान्त और रहस्य

    मूल मन्त्र, उसका पद-पद अर्थ, चौबीस अक्षरों की गणना, हर अक्षर के ऋषि, छन्द और देवता, और वेदमाता गायत्री।

  3. खण्ड 3

    साधना-विधान

    जप का समय, दिशा और आसन; वाचिक, उपांशु और मानस जप; अनुष्ठान, पुरश्चरण, उच्चारण-मार्गदर्शिका और न्यूनतम दैनिक साधना।

अष्टोत्तरशत देव-गायत्री

हर गायत्री के साथ रोमन लिप्यन्तरण तथा हिन्दी और अंग्रेज़ी भावार्थ।

  1. खण्ड 4

    108 देव-गायत्रियाँ

    वैदिक मूल और गुरु-गायत्री, गणेश एवं त्रिदेव, शिव-परिवार, विष्णु के अवतार, प्रमुख देवियाँ, दश महाविद्या, सप्त मातृका, नवग्रह, दिक्पाल, 27 नक्षत्र, पवित्र नदियाँ और आचार्य।

परिशिष्ट एवं सन्दर्भ

  1. पारिभाषिक शब्दावली

    पुस्तक में आए शास्त्रीय शब्दों के सरल अर्थ।

  2. सन्दर्भ-ग्रन्थ

    वेद, उपनिषद्, स्मृति और पुराणों के वे स्थल, जिनसे मन्त्र और सिद्धान्त मिलाए गए हैं।

सबसे पहले मूल गायत्री को शुद्ध उच्चारण और अर्थ के साथ अपनाएँ; बाकी सब उसी का विस्तार है।

— भूमिका से

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भूमिका, अनुक्रमणिका और पूरा खण्ड 1 (मन्त्र-विज्ञान) — 14 पृष्ठ का मुफ़्त नमूना (PDF)।

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श्री शिवबोध जी

इस पुस्तक के लेखक

ShivBodh Trust

वह संस्था जिसके माध्यम से यह पुस्तक ई-पुस्तक के रूप में उपलब्ध है

द्वितीय संस्करण (संशोधित ई-पुस्तक), अक्टूबर 2026 · भाषा : संस्कृत, हिन्दी एवं अंग्रेज़ी

इस पुस्तक के मन्त्र और साधना-क्रम शास्त्रीय परम्परा पर आधारित हैं। किसी भी मन्त्र का अनुष्ठान, पुरश्चरण या कुण्डलिनी-सम्बन्धी अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करें। मन्त्र-जप किसी रोग की चिकित्सा का विकल्प नहीं है; स्वास्थ्य-सम्बन्धी विषयों में चिकित्सक का परामर्श आवश्यक है।

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पुस्तक में क्या-क्या है?

चार खण्ड हैं — मन्त्र-विज्ञान; मूल गायत्री का पद-पद अर्थ और चौबीस अक्षरों के ऋषि, छन्द और देवता; जप और पुरश्चरण की साधना-विधि; और 108 देव-गायत्रियों का संग्रह।

क्या रोमन लिप्यन्तरण और अंग्रेज़ी अर्थ भी है?

हाँ। हर गायत्री देवनागरी के साथ रोमन लिप्यन्तरण में दी गई है, और उसका हिन्दी तथा अंग्रेज़ी भावार्थ भी है।

क्या केवल इस पुस्तक से गायत्री अनुष्ठान आरम्भ कर सकते हैं?

यह पुस्तक समझ और दैनिक अभ्यास में सहायता के लिए है, गुरु का स्थान लेने के लिए नहीं। कोई भी अनुष्ठान, पुरश्चरण या कुण्डलिनी-सम्बन्धी अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करें। मन्त्र-जप किसी रोग की चिकित्सा का विकल्प नहीं है।

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